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“जमीन किसी की भी हो, वर्षों पुराना रास्ता बंद नहीं कर सकते…” हिमाचल हाईकोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

Himachal Pradesh High Court News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शांति व्यवस्था बनाए रखने और पारंपरिक रास्तों को सुरक्षित रखने के लिए एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट बिना मालिकाना हक तय किए भी रुकावट हटाने का आदेश दे सकते हैं।
Published on: 9 June 2026
Himachal Pradesh High Court Decision Justice Sandeep Sharma judgment

Himachal High Court Decision: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय में स्पष्ट किया है कि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (एसडीएम) किसी भूमि के मालिकाना हक का फैसला किए बिना भी गांव के लंबे समय से उपयोग किए जा रहे रास्ते से रुकावट हटाने का आदेश दे सकते हैं।

न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि जब किसी रास्ते के उपयोग को लेकर विवाद से शांति भंग होने की आशंका बनी हो, और लोगों का उस रास्ते पर लंबे समय से स्थापित उपयोग का अधिकार हो, तब सीआरपीसी की धारा 147 के तहत एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं।

दरअसल, यह बड़ा फैसला माननीय जस्टिस संदीप शर्मा द्वारा ‘प्रमोद कुमार एंड अनदर बनाम हीरा चंद‘ मामले की सुनवाई के दौरान सुनाया गया। यह पूरा विवाद किन्नौर जिले के बस्तेरी गांव में स्थित खसरा नंबर 720 से जुड़े एक पारंपरिक रास्ते को लेकर उत्पन्न हुआ था। मामले में शिकायतकर्ता हीरा चंद का कहना था कि याचिकाकर्ताओं ने उस महत्वपूर्ण रास्ते को बंद कर दिया था, जिसका उपयोग ग्रामीण, उनके पूर्वज और यहां तक कि स्थानीय देवता की शोभायात्रा भी दशकों से अपने घरों, खेतों और श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए करती आ रही है।

मामले की जांच के दौरान स्थानीय पुलिस ने पाया था कि रास्ते में की गई इस रुकावट के कारण क्षेत्र की शांति व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। पुलिस की इस शुरुआती रिपोर्ट के बाद यह पूरा मामला एसडीएम, कल्पा के समक्ष पहुंच गया। इस मामले में तहसीलदार द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में भी इस बात की स्पष्ट पुष्टि हुई कि विवादित भूमि पर पहले से रास्ता मौजूद था और उसमें अवरोध पैदा किया गया था।

तहसीलदार की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया था कि स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार किसी भी व्यक्ति को ऐसा रास्ता बंद करने का कानूनी या पारंपरिक अधिकार नहीं है, जिसका उपयोग अन्य लोग अपने खेतों या आवश्यक स्थानों तक पहुंचने के लिए करते हों। इस मामले पर गहराई से विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में पूरी स्थिति को स्पष्ट किया।

उच्च न्यायालय ने कहा कि एसडीएम ने केवल रास्ते के उपयोग के मौजूदा अधिकार की रक्षा करने का कार्य किया है और अपने आदेश में कहीं भी भूमि के मालिकाना हक पर कोई फैसला नहीं दिया है। न्यायालय ने कानूनी स्थिति को दोहराते हुए कहा कि मालिकाना हक से जुड़े विवादों का अंतिम निर्णय करने का अधिकार केवल सक्षम सिविल कोर्ट के पास ही सुरक्षित है।

इसके साथ ही, उच्च न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि एसडीएम का यह आदेश तब तक पूरी तरह प्रभावी रहेगा जब तक कि कोई सक्षम न्यायालय स्पष्ट रूप से यह घोषित न कर दे कि संबंधित भूमि पर केवल याचिकाकर्ताओं का ही पूर्ण अधिकार और कब्जा है, तथा अन्य ग्रामीणों को उसका उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है।

इस फैसले को ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक रास्तों के संरक्षण, सार्वजनिक उपयोग के अधिकारों और सामाजिक शांति व्यवस्था बनाए रखने के संदर्भ में एक बेहद महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। यह निर्णय स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है कि एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट का प्राथमिक उद्देश्य भूमि का मालिकाना हक तय करना नहीं होता, बल्कि ऐसे विवादों के कारण समाज में उत्पन्न होने वाली अशांति को रोकना और लंबे समय से चले आ रहे आम लोगों के उपयोग के अधिकारों की रक्षा करना है।

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