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Budhi Diwali: संस्कृति और परम्पराओं के लिए प्रसिद्ध है गिरिपार की बूढ़ी दीवाली!

Budhi Diwali: संस्कृति और परम्पराओं के लिए प्रसिद्ध है गिरिपार कि बूढ़ी दीवाली!

Sirmour Budhi Diwali News: हिमाचल प्रदेश, अपनी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है। प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रीति-रिवाज देखने को मिलते हैं। आज हम सिरमौर जिले के गिरिपार क्षेत्र की एक ऐसी ही अनूठी परंपरा, बूढ़ी दिवाली ( Budhi Diwali ) पर जानकारी देंगे। केन्द्र सरकार ने गिरिपार की संस्कृति को संरक्षित करने के लिए इसे अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया है।

गिरिपार में दीपावली के एक महीने बाद बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। इस त्योहार को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। लोग दीपक जलाते हैं और हाथों में मशालें लेकर नृत्य करते हैं। इस दिन लोक गीत गाए जाते हैं और बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है। साथ ही, कई तरह के पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते हैं। यह त्योहार आमतौर पर तीन से पांच दिन तक चलता है।

बूढ़ी दिवाली का इतिहास (History of Budhi Diwali)

बूढ़ी दिवाली मनाने की परंपरा सदियों पुरानी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, वृत्तासुर नामक राक्षस के अत्याचार से परेशान होकर देवता ब्रह्मा जी के पास गए थे। ब्रह्मा जी ने महर्षि दधीची के अस्थि पिंजर से बनाए गए अस्त्र से वृत्तासुर का वध करने का उपाय बताया। देवताओं ने महर्षि दधीची के बलिदान के बाद मार्गशीर्ष अमावस्या को मशालें जलाकर खुशी मनाई। तभी से इस दिन को बूढ़ी दिवाली के रूप में मनाया जाता है।

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गिरिपार की बूढ़ी दिवाली की खासियत (Giripar’s Budhi Diwali Specialty)

सिरमौर जिले का गिरिपार क्षेत्र अपनी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां मनाई जाने वाली बूढ़ी दिवाली एक ऐसा त्योहार है जो सदियों से लोगों को जोड़ता रहा है। इस त्योहार को हर गांव में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भाईचारे और सौहार्द का वातावरण इस त्योहार की खासियत है। आधुनिकता के इस दौर में भी गिरिपार में अपनी संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास किया जाता है।

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गिरिपार में बूढ़ी दिवाली (Budhi Diwali is celebrated in Sirmaur) को ‘मशराली’ भी कहा जाता है। यह त्योहार लोगों को आपस में जोड़ता है और क्षेत्रीय संस्कृति को जीवंत रखता है। इस क्षेत्र में सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है और लोगों का संपर्क बाहरी दुनिया से कट जाता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान राम के अयोध्या वापस लौटने की खबर गिरिपार के लोगों को एक महीने देर से मिली थी। इस खुशी में उन्होंने मशालें जलाकर नाच गाना शुरू कर दिया था।

गिरिपार के अधिकांश क्षेत्रों में सर्दियों में भारी बर्फबारी होती है और तापमान शून्य से नीचे चला जाता है। ऐसे कठिन परिस्थितियों में भी लोग बूढ़ी दिवाली का त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। बर्फबारी के कारण इन क्षेत्रों का संपर्क बाहरी दुनिया से कई दिनों तक टूट जाता है।

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लेखक-हेमराज राणा सिरमौर

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